चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अगहन, पूस, माघ, फाल्गुन यह बारह महीने होते हैं | ये तीन प्रकार के हैं (१) सौर (२) चंद्र (३) सावन, एक चौथा नाक्षत्रमास भी होता है |
सौर मास संक्रांति तक, चंद्र मास अमावस्या से अमावस्या तक और सावन मास तीस दिन माना जाता है | नाक्षत्र मास सत्ताइश दिन का होता है | इनमें सौर प्रधान है | इनकी शुद्ध, अधिक, क्षय ये तीन संज्ञाये हैं | तीस दिन का मास शुद्ध मास कहलाता है | जिस समय एक ही राशि में दो बार सूर्य आ जाते हैं तो उसकी मल मास संज्ञा है | यह तीन साल बाद होता है | इसमें शुभ कार्य नहीं होते |
जो मास बिल्कुल न हो उसे क्षय मास कहते हैं | इसमें प्रजा को पीड़ा होती है जो कि पूजा-पाठ से कुछ शांत रहेगी | मल मास में खेती को हानि होती है | अतः इसमें महादेव जी की पूजा होनी चाहिए | मेषादि राशियाँ क्रम से वैशाखदि महीनों के नाम भी हैं | जैसे- मेष, वैशाख, वृष, ज्येष्ठ इत्यादि |
सौर मास संक्रांति तक, चंद्र मास अमावस्या से अमावस्या तक और सावन मास तीस दिन माना जाता है | नाक्षत्र मास सत्ताइश दिन का होता है | इनमें सौर प्रधान है | इनकी शुद्ध, अधिक, क्षय ये तीन संज्ञाये हैं | तीस दिन का मास शुद्ध मास कहलाता है | जिस समय एक ही राशि में दो बार सूर्य आ जाते हैं तो उसकी मल मास संज्ञा है | यह तीन साल बाद होता है | इसमें शुभ कार्य नहीं होते |
जो मास बिल्कुल न हो उसे क्षय मास कहते हैं | इसमें प्रजा को पीड़ा होती है जो कि पूजा-पाठ से कुछ शांत रहेगी | मल मास में खेती को हानि होती है | अतः इसमें महादेव जी की पूजा होनी चाहिए | मेषादि राशियाँ क्रम से वैशाखदि महीनों के नाम भी हैं | जैसे- मेष, वैशाख, वृष, ज्येष्ठ इत्यादि |
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